• ट्रम्प पर दो आरोप लगाए गए थे- पहला- सत्ता का दुरुपयोग, दूसरा- कांग्रेस के काम में रुकावट डालना
  • सीनेट में हुई वोटिंग में पहले आरोप पर समर्थन में 52, विरोध में 48 वोट पड़े, दूसरे आरोप पर 53-47 से जीत मिली

Dainik Bhaskar

Feb 06, 2020, 09:13 AM IST

वॉशिंगटन. अमेरिकी संसद के उच्च सदन सीनेट में बुधवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प महाभियोग के सभी आरोपों से बरी हो गए। उन पर सत्ता का दुरुपयोग करने और कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के काम में रुकावट डालने का आरोप था। सीनेट में रिपब्लिकंस (ट्रम्प की पार्टी) का बहुमत है। लिहाजा सत्ता के दुरुपयोग के आरोप पर ट्रम्प को 52-48 और कांग्रेस के काम में रुकावट डालने के आरोप पर 53-47 वोट मिले। महाभियोग के संकट से निकलने वाले ट्रम्प अमेरिकी इतिहास के तीसरे राष्ट्रपति हैं।

उटाह से सीनेटर मिट रोमनी अकेले रिपब्लिकन रहे, जिन्होंने ट्रम्प के खिलाफ (सत्ता के दुरुपयोग के समर्थन में) वोट किया। हालांकि, रोमनी ने कांग्रेस के काम में बाधा डालने के आरोप में ट्रम्प के समर्थन में वोट दिया।

डेमोक्रेट लाए थे महाभियोग प्रस्ताव

18 दिसंबर को निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्ज में ट्रम्प के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। आरोप था कि उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडीमिर जेलेंस्की पर 2020 में डेमोक्रेटिक पार्टी के संभावित उम्मीदवार जो बिडेन और उनके बेटे के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच के लिए दबाव बनाया। बिडेन के बेटे यूक्रेन की एक ऊर्जा कंपनी में बड़े अधिकारी हैं। यह भी आरोप था कि ट्रम्प ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए यूक्रेन को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोक दिया था।

तीन सदी में 3 राष्ट्रपतियों पर महाभियोग
अमेरिका के 243 सालों के इतिहास में यह तीसरा मौका था, जब किसी राष्ट्रपति पर महाभियोग की कार्रवाई हुई। 19वीं सदी में एंड्रयू जॉनसन, 20वीं सदी में बिल क्लिंटन पर महाभियोग चला।  21वीं सदी ट्रम्प पर महाभियोग की कार्रवाई हुई। इससे पूर्व जिन दोनों राष्ट्रपतियों पर महाभियोग चला, वो उनके दूसरे कार्यकाल में चला, जबकि ट्रम्प पर उनके पहले ही कार्यकाल में महाभियोग लाया गया।

ट्रम्प से पहले दो राष्ट्रपतियों पर महाभियोग क्यों चला
17वें राष्ट्रपति डेमोक्रेटिक पार्टी के जॉनसन के खिलाफ अपराध और दुराचार के आरोपों में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में महाभियोग प्रस्ताव पास हुआ था। सीनेट में जॉनसन के पक्ष में वोटिंग हुई और वे राष्ट्रपति पद से हटने से बच गए। ऐसे ही 42वें राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को ज्यूरी के सामने झूठी गवाही देने और न्याय में बाधा डालने के मामले में महाभियोग का सामना करना पड़ा था। 

1974 में राष्ट्रपति निक्सन पर अपने एक विरोधी की जासूसी करने का आरोप लगा था, लेकिन महाभियोग से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। क्योंकि उन्हें पता था कि सीनेट में मामला जाने पर इस्तीफा देना पड़ेगा।



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