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जबलपुर5 मिनट पहले

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Kerala Governor Arif Mohammad Khan said that justice did not happen to Netaji and NIA, the British left the country a year ago due to fear of Netaji. | केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा नेताजी से घबरा कर ही अंग्रेज एक वर्ष पहले देश छोड़कर चले गए, इतिहास में नहीं मिला सम्मान
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस: राष्ट्रवाद व युवा सरोकार विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्धाटन सत्र को कर रहे थे संबोधित
  • हमारे युवाओं को अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की जानकारी होनी चाहिए, समस्याएं खुद दूर हो जाएंगी

अंग्रेज 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन कुचल चुके थे। 64 हजार सैनिकों के साथ नेताजी ने मणिपुर को आजाद करा लिया था। कोलकाता की ओर तेजी से सेना आगे बढ़ रही थी। आजाद हिंद फौज की गतिविधियों और नेताजी से अंग्रेज भयभीत हो गए थे। अंग्रेजों को 1857 की क्रांति का डर पैदा हो गया था। यही कारण था कि अंग्रेज एक साल पहले 15 अगस्त 1947 को ही देश छोड़कर चले गए। यह बात नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती पर जबलपुर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने संबोधित करते हुए कही।

राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान शुक्रवार को शहीद स्मारक गोल बाजार में “नेताजी सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रवाद और युवा सरोकार विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्धाटन सत्र को मुख्य अतिथि के तौर पर संबोधित कर रहे थे। इस दौरान केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री प्रहलाद सिंह पटेल, कोलकाता से आए नेताजी के भतीजे चंद्रकुमार बोस, मेजर जनरल जीडी बख्शी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी मुख्य वक्ताओं में रहे।

इतिहास में नेताजी और आजाद हिन्द फौज को उचित स्थान नहीं मिला

राज्यपाल खान ने कहा कि इतिहास और देश के सामने कभी नेताजी और आजाद हिन्द फौज का योगदान आने ही नहीं दिया गया है। यह उस महान देशभक्त के त्याग के साथ जस्टिस नहीं है। नेताजी धीर पुरुष थे। धीर पुरुष ही न्याय के रास्ते से विचलित नहीं होते। हमारे युवाओं को अपने इतिहास व परंपराओं की जानकारी आवश्यक रूप से होनी चाहिए। ऐसा होने पर कई समस्याएं खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगी। दरअसल, भारतीय संस्कृति में न केवल भारत बल्कि दुनिया भर की समस्याएं दूर करने के तत्व मौजूद हैं।

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल।

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल।

जबलपुर में आना मेरे लिए गौरव की बात है
राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि शहर से नेताजी की यादें जुड़ी हुई हैं, यहां आना मेरे लिए गौरव की बात है। इस शहर ने नेताजी को सम्मान देकर इतिहास के पृष्ठों पर अमिट छाप छोड़ी है। नेताजी पर रामकृष्ण परमहंस व स्वामी विवेकानंद का विशेष प्रभाव रहा।
आईसीएस की परीक्षा पास कर बौद्धिकता का परिचय दिया
राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि नेताजी से आज के युवाओं को त्याग और देश के प्रति समर्पण को सीखना चाहिए। नेताजी ने 24 साल की उम्र में देश की सर्वोच्च परीक्षा आईसीएस (भारतीय सिविल सेवा) पास की, पर देश के लिए उसे छोड़ने में पल भर की देरी नहीं की।

52वें कांग्रेस अधिवेशन में चुने गए थे अध्यक्ष, तब 52 हाथियों का निकला था जुलूस

1939 में जब त्रिपुरी अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, तब उनके सम्मान में जबलपुर की सड़कों पर 52 हाथियों का जुलूस निकाला गया। उस सर्वोच्च पद को भी अपने कर्त्तव्यों की बेड़ी नहीं बनने दी और उसे त्याग दिया। नेताजी का जबलपुर से गहरा नाता रहा है। फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की तो उसकी 28वीं बैठक भी जबलपुर में की। नेताजी जबलपुर के पास सिवनी और फिर जबलपुर की सेंट्रल जेल में राजनीतिक बंदी रहे।

राष्ट्रीय संगोष्ठी में उपस्थित शहरवासी।

राष्ट्रीय संगोष्ठी में उपस्थित शहरवासी।

इतिहास को फिर से लिखने की जरूरत, देश को झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है
कोलकाता से पहुंचे नेताजी के भतीजे चंद्र कुमार बोस और मेजर जीडी बख्शी ने भी ओजस्वी तरीके से नेताजी के योगदान को याद किया। मेजर बख्शी ने कहा कि इतिहास का फिर से लेखन होना चाहिए। वामपंथी इतिहासकारों ने नेताजी सहित हजारों राष्ट्रभक्तों को इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया है।

अहिंसा आंदोलन नहीं सशस्त्र विरोध के चलते अंग्रेजों को भागना पड़ा था

देश की आजादी में आजाद हिन्द फौज की बड़ी भूमिका रही। इसी डर से अंग्रेजों को एक वर्ष पहले 1947 में देश छोड़कर भागना पड़ा। संगोष्ठी को प्रो.कपिल कुमार (दिल्ली), डॉ.राघव शरण शर्मा (बनारस), एस प्रेमानंद शर्मा (मणिपुर) व देवेंद्र शर्मा (जयपुर) व रवींद्र वाजपेयी (जबलपुर) और सिंगापुर से ऑनलाइन जुड़े मनीष त्रिपाठी ने भी संबोधित किया।
नेताजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित प्रदर्शनी का आयोजन
प्रो.कपिल कुमार के निर्देशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। वहीं 400 मीटर के कैनवास पर नेताजी का राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जबलपुर से जुड़ाव चित्रांकित हो रहा है।

200 के लगभग स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध बेहतरीन चित्रकार व फाइन आर्ट स्टूडेंट्स अपनी कला बिखेर रहे हैं। इनमें 20 गोंड़ी लोक संस्कृति के परंपरागत कलाकार भी शामिल हैं। नेताजी का हर रूप-रंग बस देखते ही बन रहा है।

कैनवास पर उतर रहा नेताजी का जीवन और संघर्ष।

कैनवास पर उतर रहा नेताजी का जीवन और संघर्ष।

पारंगत चित्रकार 1939 के जबलपुर के त्रिपुरी अधिवेशन से लेकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर की आंखों में आंखों डालकर हाथ मिलाते नेताजी और आजाद हिंद फौज व रानी झांसी रेजीमेंट के गठन के दृश्य कैनवास पर जीवंत कर रहे हैं।

1931 से 1933 तक नेताजी जबलपुर के सेंट्रल जेल में बंद रहे, त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान उन्हें 104 डिग्री बुखार था, फिर भी महात्मा गांधी के प्रत्याशी को हराकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए, जैसे इतिहास के पन्ने चित्रों में साकार हो रहे हैं।

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