• आगरमालवा के मजदूरों को गांव मेें अस्थाई बस्ती बनाने की नहीं मिली जगह, 42 डिग्री की तपन में साड़ी-दुपट्‌टों के टपरों में रहना पड़ रहा
  • मामले की जानकारी टोडरा पंचायत के सचिव व रोजगार सहायक को थी, उनकी जांच कराई गई और शौचालय में क्वारैंटाइन कर दिया 

दैनिक भास्कर

May 03, 2020, 10:15 PM IST

गुना. कोरोनाकाल में मानवीयता के कई उदाहरण और तस्वीरें सामने आ रही हैं लेकिन साथ ही इस रोग के डर और इसे लेकर आधी अधूरी जानकारी ने समाज में एक तरह की असंवेदनशीनलता भी पैदा कर दी है। इसका शिकार सबसे ज्यादा मजदूर वर्ग हो रहा है, जो बाहर से अपने घर लौटे हैं। रविवार को जिले के जामनेर क्षेत्र की पंचायत टोडरा गग्राम पंचायत से ऐसी ही त्रासद तस्वीर सामने आई है, जहां एक परिवार को स्कूल के शौचालय में शरण लेना पड़ी। इस परिवार की कोरोना की जांच भी हो गई थी। इसके बाद भी जब गांव में घुसने नहीं दिया तो उनको स्कूल के शौचालय में शरण लेनी पड़ी। वहीं पर वहीं पर भोजन बनाया और खाया भी।  

कांग्रेस ने ट्वीट कर कहा- शिवराज जी बिलकुल लज्जा नहीं आती 

स्कूल भवन में ताला लगा था तो अंदर भी नहीं जा सके

भैयालाल सहरिया, उसकी पत्नी भूरीबाई अपने दो बच्चों के साथ राजगढ़ जिले के पुरा बरेटा गांव में मजदूरी के लिए गए थे। शनिवार शाम को करीब 7 बजे वे लौटे थे। इसकी जानकारी टोडरा पंचायत के सचिव व रोजगार सहायक को थी। उनकी बाकायदा जांच की गई। इसके बाद होना यह था कि कर्मचारी उन्हें क्वारैंटाइन कराते। उन्हें उनके घर में रखा जा सकता था। उधर, परिवार के लोग जब गांव पहुंचे तो उन्हें वहां से भगा दिया गया। रात में तो वे देवीपुरा के प्राइमरी स्कूल के बाहर ही रुक गए। सुबह जब धूप चढ़ने लगी तो उन्हें मजबूरी में स्कूल के शौचालय में शरण लेना पड़ी। स्कूल भवन में ताला लगा था इसलिए वे उसके अंदर भी नहीं जा सकते थे। शौचालय में ही परिवार ने खाना बनाया और वहीं बैठकर खाया। 

If the village was not allowed to enter the village, the tribal family had to take shelter in the school toilets, made food and ate it there. | गांव में नहीं घुसने दिया तो आदिवासी परिवार ने स्कूल के शौचालय में शरण ली, वहीं खाना बनाया, कांग्रेस ने कहा- शिवराज जी, भगवान से थोड़ा तो डरो
पति-पत्नी ने शौचालय में ही शरण ली और फिर भोजन भी बनाकर खाया। 

गांव में घुसने नहीं दे रहे और न ही कोई आसरा मिल रहा 
गांवों में घूम-घूमकर छोटे मोटे सामान बेचकर गुजारा करने वालों पर भी लॉकडाउन की मार पड़ी है। चाहे अगरिया समुदाय के लोग हों या फिर ढोलक आदि बेचने वाले। आगर-मालवा से आए मजदूर भी परेशान हैं। उन्हें एक माह से उन्हें गांवों में नहीं घुसने दिया जा रहा है, जहां वे हर साल अपना छोटा मोटा काराेबार चला लेते थे। करीब 29 लोगों के इस समूह के मुखिया ताज मोहम्मद बताते हैं कि हम लोग 3-4 माह तक सामान बेचकर वापस लौट जाते हैं। यहां हमारा स्थाई ठिकाना नहीं है लेकिन अब तक बस्ती के बीच कहीं छांव में उन्हें रहने दिया जाता था। अब हालत यह है कि यह पूरा समूह डोंगर गांव के बाहर एक खाली जगह पर रहने को मजबूर हैं।





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